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बेहोशी और...

निस्तेज  नभ की उनमुक्त पवन में भांग चढ़ाए फिरता हूँ, निपट अंधेरी रातो में मैं बांग लगाए फिरता हूँ, होश  में रहने वाले इश्क़ भला कब जानेंगे! एक बोतल में सारे संसार का उन्माद समाए फिरता हूँ| आसमॉ में रहकर समझदारी भी बहुत सीखी है, अब रोज नया इक गढ्ढा खोद मैं रोज उसमे गिरता हूँ | खोखला कर चुके मुझे इंसानी कानून-ओ-अदब, जहाँ डू
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