निस्तेज नभ की उनमुक्त पवन में भांग चढ़ाए फिरता हूँ,
निपट अंधेरी रातो में मैं बांग लगाए फिरता हूँ,
होश में रहने वाले इश्क़ भला कब जानेंगे!
एक बोतल में सारे संसार का उन्माद समाए फिरता हूँ|
आसमॉ में रहकर समझदारी भी बहुत सीखी है,
अब रोज नया इक गढ्ढा खोद मैं रोज उसमे गिरता हूँ |
खोखला कर चुके मुझे इंसानी कानून-ओ-अदब,
जहाँ डूब गए सब बड़े-बड़े उन तालाबो में तिरता हूँ |
सुबह कहाँ है, शाम कहाँ है, वक्त एक सा सारा है,
मैं आजकल घड़ियो का कारोबार सजाए फिरता हूँ |
सारा हल्का हो जाता हूँ मधुशाला के पथपर जाकर,
दोनो कंधो पर 'खाली'गठरी का जो बोझ उठाए फिरता हूँ |
कोर संभाले रोटी पर जब टुकड़े-टुकड़े होते है,
किस कदर नाराज़ सा मैं गोंद ढूंढता फिरता हूँ ||