कल रात तुम आए थे मै दूर खड़ा तुम्हे देख रहा था, तुमने नीले रंग का कुर्ता पहना था वैसे तुम्हे झुमके पहनने का उतना शौक नहीं है लेकिन तुमने पहने हुए थे ऐसा लग रहा था जैसे दिवाली का समय है। तुम मुस्कुराकर खुद को है निहार रहे थे और दूर खड़ा मै तुम्हे देखकर मंद मंद मुस्करा रहा था। इतनी देर में किसी ने तुम्हे पुकारा और तुम चले गए मै वहीं चौखट पर बैठा तुम्हारे बारे में अपने बारे में सोच रहा था, ये भी सोचा कि कहीं तुम मुझे भूल गई और भी बहुत कुछ। इन सब के बीच मेरे पीठ पर एक हाथ आया और पीछे से आवाज़ आई बाबा तुम यहां क्यों बैठे हो अन्दर चलो मिठाई नहीं खानी है क्या तुम्हे देखकर ना जाने क्यूं मेरी आंख भर आई तुम्हारा हाथ मेरे गालों तक आया और तुमने कहा अरे ऐसे रोते नहीं और आसू पोछा और दुलारा। इतना सब देख कर मैंने तुम्हे गले से लगा लिया और आगे कुछ बोलता उससे पहले आंख खुल गई और मै जाग गया। सुनो ऐसे ही आज फिर आना बहुत सी बातें है जो तुमको बतानी है। आज या कल जब समय मिले तब एक बार दोबारा आना।
- शाश्वत


