अभी अभी तो जागा था फिर से सूला दिया है उसे उम्मीदों के सहारे हमने ठोकरों से ही अपनी पेटे भर ली है क्या-कहे कि हमारे नसीब में भूख नहीं है हाथ में कटोरी तो है लेकिन खाने के लियें रोटी नहीं है भीख मांगे भी तो किससे माँगे यहाँ पर जो कोई अपना नहीं है  शराब के ठेको पर लाइनें लगी है और किसान का चूल्हा महीनों से नहीं जला है नेताओं के सूट करोड़ो में बिकते है और किसानो का सर फंदो पर लटका है