ये पता ना चला
बिस्तर की सिलवटें
निकालती रही
पर,कब अपना चेहरा
सिलवटो से भर गया
ये पता ना चला
अपनो के सपनों को
संवारती रही
पर, कब अपने सपने
कहीं रख छोड़े
ये पता ना चला
अपनो की पसंद मे दिनरात
उलझती रही
पर, कब अपने को ही
कहीं खो दिया
ये पता ना चला
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