स्नेहमयी छाया
मात पिता है सुख की छांव,
मन्दिर मस्जिद हैं इन के पांव,
ना भूलो इन हाथो ने,
बचपन तेरा सींचा था,
तेरा सपना पूरा करने,
अपना पल्लू खींचा था,
याद करो उस उँगली को,
पग पग चलना सिखलाया,
जब जब भी तू गिर जाता,
हंस हंस कर है बहलाया
अंधाधुँध पैसे की दौड़,
बस आगे बढ़ने की होड़
अपनो को ही पीछे छोड़,
आ पहुँचा तू कैसे मोड़ ?
( माता-पिता की मनोदशा)
धुँधली आँखें, दो ठहरे अश्रु,
तेरी ही राह निहार रही,
बस तू मुझ से दूर ना जा,
तेरी ही माँ पुकार रही,
कपंकपाते बूढ़े हाथ,
ना जाने क्या टटोल रहे,
रखूँ किस कंधे पे सर ?
इधर उधर है डोल रहे,
रुक जा , थम जा,
ना तू देना ,इन को घाव,
इक बार गये, ना लौटे गे,
खो ही देगा इन की छांव
शशि सेतिया
(Sash out of ash)
