समय की पुकार

हे वीर पुरूष, तुम धीर धरो,

चलो उठो, आभीर बनो,

कुण्ठित जन मानस की,

घायल आँखों के वीर बनो।

बाधाओं को बांध बना, चट्टानों पे फूल खिला,

काँटों भरी इस बगिया में, नवजीवन का पथ दिखला।

कई रूप में अजगर पलते हैं,

कई रुप में रावण मिलते हैं,

कुछ कायरों की नगरी में,

झूठ कभी-कभी फलते हैं।

उठ वीर पुरुष, इस आडम्बर से मत घबरा,

तेरी शिराओं मे, है वीरांगना का खून भरा ।

राह के कुछ काँटे,

समय को रोक नहीं सकते,

झूठे पुलिन्दों से,

सच को ढका नहीं करते।

हे युग पुरुष , तू कष्टों से ना घबरा,

गीता है तेरे रग- रग मे, ये धर्म तेरा , ये कर्म तेरा।

धन्य है जो नियति ने है तुम्हें चुना

कब सब को ये मिलता है, तू भारत माँ का क़र्ज़ चुका ।

शशि सेतिया