नन्ही कली
( हमारे समाज में जहां कन्या को देवी समान पूजा जाता है , वहीं कन्या के जन्म के समय का वर्णन व उसकी जीवन यात्रा,कविता के माध्यम से)
ना थी थाली की वो छनछन,
ना थी बजी शहनाई,
ना थी कहीं वो हँसी ख़ुशी,
ना थी कही बधाई,
अरे क्यूँ है ये तन्हाई ?
इ क नन्ही कली है आई
हाँ हाँ , नन्ही कली है आई
पलक उठा आँचल में देखा,
दो नयनों को झरते देखा,
कुछ सहमी, कुछ डरी हुई सी
कभी हँसते, कभी रोते देखा,
होले से वो मुसकाई,
क्यूँ है तू मुरझाई?
माँ , मैं तेरा रूप ले आई
इक नन्ही कली है आई
दिन बदले , ऋृतुएं बदली
नन्हें पग अब थिरकने,
रंग बिरंगे पंख लगा,
घर आँगन में लगी थिरकने
पल पल करते बरस यूँ बीते,
यौवन ने ली अँगड़ाई ,
इक नन्ही कली है आई,
भाई के संग हँसते खेलते,
सोते जगते, हँसते रोते,
अपने अरमां, अपने सपने,
बस यूँ ही न्योछावर करते,
सपनों को झोली में भर ,
घर से हुई विदाई,
इक नन्ही कली है आई,
आँखें खोज रही है अपने,
संग लिए वो बिखरे सपने,
थकी हुई है चलते-चलते,
बूढ़ी आँख हैं,पग हैं ठिठकते,
हर चौखट अजमाई,
ना किसी ने बाँह फैलाई,
बस यूँ ही रही पराई
क्यूँ ...नन्ही कली थी आई ?
शशि सेतिया
(Sash out of ash)
