मर्यादा और संस्कारों में, क़ैद हुए जो, पीड़ा सहते, दबे पड़े है बरसो से उन लफ़्ज़ों को..... आज़ाद करो..., अंजाम तो दो उन लफ़्ज़ों को.... राख की ढेर में , दबे हुए हैं ... सुलगे हैं जो बरसो से, उन टूटे बिखरे सपनों को आकार तो दो... एक नया अंदाज तो दो उन सपनों को