कोरोना..इक समय चक्र 


समय बदल चुका है,मित्रों 

हम ये माने या ना माने,

समय का पहिया है ये , मित्रों 

हम ये जाने या ना जाने,


हम स्वयं को कैसे समझाये,

क्या अच्छा है , क्या बुरा ,

हम कौन हैं , जो बतलाये 

कौन जीता , या कौन हरा,


क्यूँ  हम इतना जाने

क्यूँ  ईश्वर को पहचाने,

 मन्दिर में ,  मस्जिद में

हर जन में क्यूँ ना माने,


बार बार वो आहट देता ,

बार बार वो बतलाता,

कभी बने वो आंधी तूफ़ा,

कभी सुनामी ले आता,


पर हम अंधी धुन के मतवाले,

अपने अपने अहम को पाले,

नन्हेअनदेखे कीट के आगे

जान के सब को पड़ गये लाले,


पशु पक्षी सब मद मस्त,

देखो ये स्वतंत्र हुए,

पर हम अपने ही मद से,

घर में ही बस क़ैद हुए,


सागर की लहरों को देखो

उमड़ उमड़ कर बह रही

रूक जाथम जा

गरज गरज कर कह रही


श्वेत बर्फ़ की चादर ओढ़े,

हिमालय भी इतरा रहा ,

पूछ रहा है क्यूँ ?

मुझे यूँ धूमिल कर डाला,


मैं ही तो हूँ सब का गौरव

मुझ से ही नदियों में चाल

दुश्मन की काली नज़रों से,

बनता हूँ मैं तेरी ढाल


दूर करे , झूठे आडम्बर ,

आज तो ये निश्चय कर ही ले,

थोड़े ‘ के मंत्र को अपना कर

अपना प्रायश्चित कर ही ले,


जीव जन्तु और वन सम्पदा से,

वसुंधरा सजी रहे

सादा जीवन , सादा भोजन,

संसाधन  व्यर्थ करे,


फिर ना कोई भूखा होगा

ना कोई आँगन छोड़े गा

ना कोई फिर छिपा जियेगा,

ना कोई फिर कष्ट सहेगा

             Shashi Setia

         ( Sash out of ash