हे मन

हे मन,

क्या कहने को है तू आतुर

क्या सुनने को है तू तत्पर

स्वयं से ही प्रश्न करे

स्वयं से ही उत्तर खोजे

क्या है पाना, कैसी होड़

कहाँ है जाना, कहाँ है मोड़

क्यूँ है दिन रात तू भटके

बार बार तेरे पग क्यूँ अटके

जीवन तेरा है अनमोल

हर इक साँस , हर शब्द का मोल

क्यूँ है जीते जी भरमाये

क्यूँ हे मरने से घबराये

जाने कब वो पल आ जाये

अपनी करनी पर पछताये

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