इक चाह मेरी
.........इक चाह मेरी,
उड़ जाऊँ इक पंछी बन
जा पहुँचु मैं नील गगन,
पवन संग करुँ अठखेली,
खिली धूप हो नई नवेली,
बादल में छिप जाऊँ,
.............इक चाह मेरी ।
...........इक चाह मेरी,
उड़ जाऊँ इक तितली बन,
महकूँ मैं हर वन उपवन,
चूमुँ हर कली फूल को,
पहनूँ रंगों की अचकन,
भँवरों सा गुनगुनाऊँ,
........... इक चाह मेरी ।
...............इक चाह मेरी,
धन्य हुई मैं मानव बन,
फिर भी भटके मेरा मन,
कयूं हूँ मैं हर पल विचलित,
मानूँ साँसों की पूँजी सीमित,
ख़ुद को कैसे समझाऊँ,
.......इक चाह मेरी ।
शशि सेतिया


