वाह रे क़ुदरत तेरी माया, अंडे में है जीवन पाया, कब तूने सांसे दे डाली ? कब है नन्हा दिल धडकाया? नन्ही चोंच व नन्ही आँखें, कब पंखों से मुझे सजाया?   पल पल करते,पल पल करते हर पल यूँ ही सासें गिनते , लुढ़क पड़क कर,लुढ़क पड़क कर, बस यूँ ही गिरते पड़ते, किस दिन बाहर आ पाऊँ ? बस यूँ ही इन्तज़ार ही करते   आखिर वो पल भी आया, अंडे से छुटकारा पाया, बाहर दुनिया रंग बिरंगी, देख देख फूला न समाया।   दिन में सूरज की गरमी, शीतल रातों की सर्दी , रिमझिम बारिश की बूँदे, कभी तेज़ पवन में झूमे, कभी इधर ओ कभी उधर, मिट्टी में अपने को रोंदे ।   व्याकुल माँ ये कोशिश करती, पंखों से है उसको ढकती, कहीं बाघ है कहीं शिकारी, तू नादान है, तू बड़ा अनाड़ी , मन कोमल ते री कोमल काया, तेरी समझ ये क्यूँ ना आया?   मां, तू मेरी फ़िकर ना कर, कया है जो मेरे नन्हें पर, दृढ इच्छा के पंखों से , बन जाती नभ में है डगर,   जीवन की इस राह पर , दुख से नहीं घबराते हैं, गिरते रहते चट्टानों से, धैर्य नहीं वो खोते हैं, वे पत्थर का क्या चीज़ है, पर्वत भी सरका लेते हैं। _____________________________