आह्वान
मर्यादा ओर संस्कारों में ...........दबे पड़े है
क़ैद हुए जो बरसो से
उन कुचले , मचले शब्दों को
एक नयी आवाज़ तो दो.....
राख की ढेर में ..........दबे पड़े है
सुलगे है जो बरसो से
उन टूटे, बिखरे सपनों को
एक नया आकार तो दो.......
सहमे , कँपते अधरों में .........दबे पड़े है
भटके है जो बरसो से
उन अटके -लटके भावो को
एक नया आह्वान को दो.........
शशि सेतिया


