हाहाकार

प्रचंड

प्रलय  

 नव नव रूपों की रेखा,

शक्ति की जो स्वरूपा,

खंड खंड

 स्मित छाया।

नारी

हाय चकित !

मैं सोच रही

क्या

नारी तुम केवल श्रद्धा बन

संवरोगी

सहोगी

त्यागी बन पिसती जाओगी

या खण्डितकर इस पाखंड

विचारों को

खुद को स्वतंत्र कर दोगी

तेरे चरित्र की पवित्रता का

अग्नि परीक्षा ही दोगी

कब तक?

अपने मे कौशल भर

उड़ान भरो

तुम पंछी सा।

तू किसलय की बूंद न बन,

द्रोपदी सी करुण पुकार न कर,

काली बन मुसटी प्रहार कर,

खंड खंड भुज सीस औ

धड़

दृष्टि जहां कुदृष्टि बने

तून जननी है

अबला न बन.....


शशि द्विवेदी

प्राथमिक विद्यालय छीतमपुर

चोलापुर वाराणसी