कब तक उनकी स्मृतियों को,

समेटूं अपने शब्दों में मैं ,

कब तक मेरी वेदनाओं को ,

सहेजूं अपने पंक्तियों में मैं ।


स्मृतियां अखंड अंबर हैं,

शब्द मेरे महज़ बादल ,

वेदनाएं असीम समंदर हैं,

पंक्तियां मेरी महज़ लहर।


अब सहन होता ना मुझसे,

निस्पंद इन स्मृतियों का भार,

अब लिखा जाता ना मुझसे,

मेरे विकल मन:स्थिति का सार।


देव! तनिक यदि करुणा है तुझमें ,

ले चल मुझे उन तारों के पास,

सुना है, तारा ही बन गए हैं वो,

सौंपकर ये स्मृतियां मेरे पास ।

– शशि रं शांडिल्य