बिखड़ा मन,
तन्हा जीवन,
काफ़िले में हूं,
पर, अकेला हूं।
इज्तिराब – ए – पर लिए,
उड़ने की अभिलाषा लिए,
नशेमन में मैं कैद हूं।
प्रिय! जो तुम लौट आओ,
तो शाहाअत मेरी लौट आए,
तोड़ दूं नशेमन की बेड़ियों को,
खुले नभ में हम उड़ जाए।
– शशि रं शांडिल्य
बिखड़ा मन,
तन्हा जीवन,
काफ़िले में हूं,
पर, अकेला हूं।
इज्तिराब – ए – पर लिए,
उड़ने की अभिलाषा लिए,
नशेमन में मैं कैद हूं।
प्रिय! जो तुम लौट आओ,
तो शाहाअत मेरी लौट आए,
तोड़ दूं नशेमन की बेड़ियों को,
खुले नभ में हम उड़ जाए।
– शशि रं शांडिल्य