बाबा बुआ के पैदाइश पर,
कहते थे,चूल्हा–चौकी सीखेगी,
और सीखेगी पुरुषों की सेवा,
फिर,ब्याह दी जाएगी,अनजान
किसी सरकारी दफ़्तर के नौकर से।
चाचा बहन की पैदाइश पर,
कहते है बड़े गौरवान्वित होकर,
ज़माना बदल गया है,बेटा!
पढ़ाएंगे–लिखाएंगे गुड़िया को,
ताकि,ब्याह हो सके,अनजान
किसी सरकारी दफ़्तर के नौकर से।
वो कल बेटी को नहीं पढ़ाए,
ब्याह के लिए,
वो आज यदि बेटी को पढ़ा रहे,
ब्याह के लिए।
यह समाज बेटियों को,
लाइसेंस की मानिंद ब्याह कराकर,
संतानोत्पत्ति का यंत्र कब तक मानेगी?
कब तक होगी सीता की अग्निपरीक्षा,
और,राम बिन परीक्षा पत्नीव्रता कहलाएंगे?
– शशि रं शांडिल्य


