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ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी

ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।। कुछ ऐसे इन घड़ियों को मान लो, जैसे साथ चलते-चलते चुभा एक कांटा, और तुझको उठा कर भर लिया हो बाहों में, और हया के मारे तू कुछ बोल ना पा री हो।। मैं भी हर पल बस तुझको याद किये जा रहा, और दिल को समझाने कि कोशिश भर होती है, जबकी पता है मुझको बात इतनी बड़ी भी नहीं।। पर पागल जब कोई हो गया हो, ओर ये रोग लग गया हो, तो इसका इलाज फिर कहाँ है?? पर ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।। हाल इधर भी कुछ ऐसा है प्रेयसी, कि शब्द नहीं है करने को बयां, पर शायद दिल तो सब समझता है।। क्यूँ न करें हम चलो ऐसे, कि करें उन बातों को सच
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