ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।। कुछ ऐसे इन घड़ियों को मान लो, जैसे साथ चलते-चलते चुभा एक कांटा, और तुझको उठा कर भर लिया हो बाहों में, और हया के मारे तू कुछ बोल ना पा री हो।। मैं भी हर पल बस तुझको याद किये जा रहा, और दिल को समझाने कि कोशिश भर होती है, जबकी पता है मुझको बात इतनी बड़ी भी नहीं।। पर पागल जब कोई हो गया हो, ओर ये रोग लग गया हो, तो इसका इलाज फिर कहाँ है?? पर ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।। हाल इधर भी कुछ ऐसा है प्रेयसी, कि शब्द नहीं है करने को बयां, पर शायद दिल तो सब समझता है।। क्यूँ न करें हम चलो ऐसे, कि करें उन बातों को सच, मान के दूजे को बगल में सो जाएँ, एक दूजे के प्रतीकों को होठों से लगाएं, और कोशिश करें फिर मुस्कुराने की।। मुस्कुराएँ हाथ पकड़ना याद करके, वो छेड़ना-खेलना याद करके, वो शुरुआत के दिनों की बातें याद करके, वो मेरी बेवकूफियां याद करके... पर ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।। नहीं लिख सकता मैं सब कुछ ऐसे, पर पता है तू समझ गयी.. तेरी मौज़ूदगी अपनी हर धड़कन में मान के, छलकते आंसू किसी तरह छुपा के, ओर जल्द ही सब ठीक होने की उम्मीद लिये, मैं कोशिश करता हूँ सोने की... फिर नींद में तुझको पाकर, मैं यही समझाता हूँ.. की ना घबराना तुम ऐ प्रेयसी ढलेंगी ये मुश्किल रातें, फिर से वक़्त मुस्कुरायेगा फिर से होंगी वो सारी बातें ।।