ऐसी बरसती बरखा में,
मैं ना खुद को रोक पाया..
पलकों पर पहली बूंद जो गिरी,
बस तू ही मुझको याद आया..!!
हथेली दोनों अपनी फैलाए,
खुद को रिमझिम अहसास कराया..
बंद हुए जब मेरे नयना,
हाथों में तेरा हाथ पाया..!!
आ कर कानों में मेरे,
मौसम ने कुछ गुनगुनाया..
मद्धम मुझको गीत सुनाकर
एक दिल का संदेश बताया..!!
बोला मुझसे कि है कहीं कोई,
खुद में तेरी याद छिपाया..
तेरे जैसी वो भी भीगती,
बूंदों में अपना हाथ फैलाया..!!
बंद आँखों में तुझको ही बसाकर,
बारिश में उसने खुद को लुटाया..!!
सुनाया जो गीत तुझे मौसम ने,
वो है तेरी प्रेयसी ने गाया..!!
फिर आई चेहरे पे मुस्कान मेरे,
बूंदों में तूने जब नाम लुटाया..
ओर मेरे दिल की धड़कन से,
है तेरा चेहरा खिलखिलाया..!
इतनी कुऱबतों के होने पर भी,
हमको क्यों तूने अलग बसाया..
सवाल जब ये पूछा मैंने,
बरखा से जवाब कुछ ऐसा पाया..!!
बोली बरखा दो बूंदों को,
मैंनें अलग-अलग है उठाया..
ज़मीन से आसमान तक देखो,
एक लम्बा सफर है तय कराया..!!
हज़ार गर्दिशों पर भी उन्होंने,
बादलों तक साथ निभाया..
अलग रहते वो चले साथ-साथ,
फिर कुदरत ने ही उन्हें मिलाया..!!
हुआ मुक्कमल ऐसे इश्क उनका,
सारा जहाऩ बस उन्हें बुलाया..
बनके बारिश वो बरसे जब,
सबको अपने इश्क में नहलाया..!!
ईतनी बातें हुईं इस मौसम से,
इक याद दिलाया इक पाठ पढ़ाया..
पलकों पर आखिरी बूंद जो गिरी,
बस तू ही मुझको याद आया..!