थोड़ी और अभी है आज़ादी..
कहीं किसी के दिल के अंदर,
कहीं किसी के घर के बाहर,
किसी के रूढी़वादी सोच में,
किसी के बेड़ियों रूपी मोच में,
किसी को ये भरी दुनिया भी,
बेबस आज है कर जाती.,
थोड़ी और अभी है आज़ादी..!!
कहीं सिसकते मोहब्बत के दर्द में,
कहीं अंधे समाज के काले गर्द में,
कहीं भूखे पेट की तड़प में,
कहीं पैसों की कर्क झड़प में,
कहीं हद से ज्यादा भी है,
आज़ादी बन बैठी बरबादी.,
थोड़ी और अभी है आज़ादी..!!
जब-जब देखा तुझको ऐ वतन,
मैंने अपनी आँखों से,
तब-तब मैंने किया जतन,
ना उतारूँ तुझको सिराखों से.,
पर हर बार हुआ कुछ ऐसा है,
कहीं कमी कुछ गुलामी जैसा है,
कहीं इंसानियत खोती जैसी है,
कहीं देवियाँ ही रोती जैसी हैं
कहो मंज़िल तक पहुँचने के लिए,
फिर कौन बनेगा इस दौर का बाघी.,
थोड़ी और अभी है आज़ादी..!!