"रिश्ता" मेरी ग़ज़ल के चंद शेर तुम्हें किसी की याद दिला जाएँ तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। कभी चाँद और चांदनी से ज़्यादा रात पसंद आ जाए तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। कभी सूखे हुए पत्ते हवा से इश्क करते दिखें तो ज़रा वहीँ ठहर जाना.. हिना के जैसे खुद महक जाओ तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। बेवक़्त बारिश की चंद बूँदें जो कभी तुम्हें रूह तक भीगा दें.... मन किसी कागज़ की नाव सा हो जाए तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। उस राह से जो गुज़रो तो एक घर की तरफ देखना.. खिडकियों का रंग वही दिख जाए तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। शहर से दूर तो चले जाओ मगर हवाओं से रिश्ता नही तोड़ो.. आईने में कभी मंज़र वही दिख जाए तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है। कर्ज़ है हर नज़्म जिसे कभी तुझे सोच के लिखता हूँ पढ़ के इन्हें जो मेरा भाव बढ़ जाए तो समझ लेना मुहब्बत ने अपना काम कर दिया है।।