परबत पिघल कर निकला था जो गंगा का पानी
सागर तक बहते बहते मैला बन गया
पिए गांव के झरनों से जो मुफ्त का मीठा पानी
शहरों तक बिकते बिकते ज़हर बन गया
घर से जो चल पड़ा था लेकर बाप की अमीरी
आंगन तक चलते चलते फ़कीर बन गया
चट्टानों से पत्थर गिरा जो कोयलों के खानों में
कोयलों में पलते पलते वो हीरा बन गया
-शशांक

