बड़ी है ये दुनिया, बड़े हैं निवासी

मैं अदना मुसाफिर, हूँ जैसे प्रवासी।

नहीं गाड़ी बंगला, न लाखों की दौलत

हड़प लूँ किसी का, न ऐसी है नीयत ।

फिर भी विलक्षण, मैं लगता निराला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


‘सनम’ क्या कहूँ, तुमसे अपनी कहानी

दुःखों से सजी है, मेरी जिंदगानी ।

रोटी की खातिर, मैं करतब दिखाऊँ

कर्मठता की मैं, विरासत चलाऊँ ।

मगर फिर भी दुनिया, कहे ‘धूर्त साला’

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


प्रतिदिन मैं तड़के, अंधेरे में उठता

ठेले को अपने, मैं पानी से धुलता ।

उसको सजाता , मैं श्रंगार करता

मंदिर की मूरत सा, पूजन मैं करता ।

झूम के चलता ज्यों, कान का बाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


नहीं मुझमें इच्छा, करोड़ों कमाऊँ

जबरन किसी की, प्रॉपर्टी लिखाऊँ ।

ना उल्लू बनाऊँ, मैं तिकड़म लगाकर

भरूँ जेब अपनी, न पिस्टल दिखाकर ।

नजर में है पानी, न मैं मन का काला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


नहीं मुझमें हिम्मत, करूँ धोखेबाजी

फर्जी फंसाकर, करूँ सौदेबाजी ।

अपने धरम से, कभी भी ना भटकूँ

न रोजी खातिर, मैं जेब को कतरूँ ।

है दिल मेरा सच्चा, मैं हूँ भोला-भाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


न मुझमें बे-गैरत, न आलस की आदत

न मुझमें कपट है, न चोरी की चाहत ।

न उँगली करूँ, काम से काम रखूँ

अपने पड़ोसन का, न माल चखूँ ।

अच्छे करम कर, मैं खोजूँ निवाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


प्रतिदिन लगन से, चलूँ अपने पथ पर

मैं सो जाऊँ भूखा, न भटकूँ डगर पर ।

शिद्दत, समर्पण से, मेहनत हूँ करता

न ही चापलूसी से, मैं पेट भरता ।

नहीं हमने सीखा, करूँ घाला-मेला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


न ख्वाहिश मेरी, जाकर मैं बैंक लूटूँ

या राहों में औरत का , मैं हार खींचूँ ।

नहीं चाह मेरी, मैं विद्या को बेचूँ

अकारण, प्रयोजन, सुविधा शुल्क ले लूँ ।

जो ये भाव आए, दूँ प्रभु का हवाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


अगर मैं कभी, किसी के द्वार जाऊँ

गलियों, चौबारे में ठेला लगाऊँ ।

तो भी दिखाऊँ, मैं मानवता प्यारी

न फाड़ूँ निगाहों से, नारी की साड़ी ।

क्योंकि है मानव, धर्म सबसे आला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


न ऐसा हुनर है, कि मैं झांसा दे दूँ

मोटी रकम ले-ले, मैं बेल दे दूँ ।

न लिखना ही आए, कि धारा लगाकर

बिना जुर्म, धन मांगूँ, वर्दी दिखाकर ।

अभी तक हुआ न, है ये रोग काला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ मैं ठेले वाला ।


आए जो गर्मी, उसे मैं हराऊँ

गन्ने का रस, नींबू-पानी पिलाऊँ ।

बेल का सरबत, आम का सरबत

लस्सी पिला ठंढी, करता हिफाजत ।

गर्मी का देखो है, निकला दिवाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ मैं ठेले वाला ।


टिकिया वा फुल्की, है मेरी निशानी

बर्गर की यादें तो, सदियों पुरानी ।

कहीं फ्राइड राईस, कहीं छोले- खस्ता

औ छुटकी बिटियवा का, लागूँ मैं सस्ता ।

है बोले मैं लूँगी, गुब्बारा लाल वाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


सब्जी व भाजी की हरियर जवानी

सजे मेरे ठेले पर, लगती तूफानी ।

टमाटर, चुकंदर, मटर गोभी भांटा

हिसाबय से तौलो, न हो तिरछा कांटा ।

जो है चोर मुझको, शराफत सिखाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ मैं ठेले वाला ।


लाई चना जब, सजाई के निकली

देखतय बहुरिया का आईगय हिचकी ।

मैंगो, पपैया, अनानास, एप्पल

ठेला नहीं चलता फिरता है गूगल ।

औ अंगूर केला, रहे टॉप वाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


लेकिन ‘सनम’ आज दुनिया को देखो

हम लोगों में सारे मुजरिम हैं दिखते ।

लुच्चे, लफंगे, अमीर, सियासी

लूटें जो देश, न हो उनको फांसी ।

हमको खदेड़ें, ज्यों देश निकाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


होटल में लोग, हजारों लुटाते

मुझे जब भी देते, तो नखरे दिखाते ।

कोई दस छुड़ाये, कोई पाँच रोके

बहुत मंहगा देते हो, कोई है टोके ।

फिर भी हैं कहते, रहे स्वाद आला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ मैं ठेले वाला ।


सड़क किनारे हम, ठेला लगाते

मेहनत से अपनी हैं,रोजी कमाते ।

पर पुलिस लुटे, कचहरी भी लुटे

बिन किसी कारण के, दंडे से पीटे।

समझे हैं जैसे हूँ, आतंक वाला

हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।


हूँ, मैं ठेले वाला, हूँ, मैं ठेले वाला ।





---------ShashankmY’सनम’---------