सपनों की इस दुनिया से, बाहर निकलो इंसानों
तेरी क्या औकात जरा, तुम इसको भी तो पहचानो II
तेरी ही मनमानी का, देखो है कैसा किस्सा
तेरी करनी भुगत रहा है, दुनिया का हर हिस्सा II
तुमने देखा था सपना, सर्व-शक्तिमान बनने का
लेकिन ऐसा करने में क्यूँ, जतन किया मरने का II
कहलाते आए हो अब तक, बुद्धिमान प्राणी, पर
तुमसे बड़ कर बहसी कोई, नहीं हुआ धरती पर II
धरती कितनी प्यारी थी, प्यारी थी इसकी हर माया
लेकिन तुमने लालच में, इसको कलुषित है कर डाला II
नदिया, झील, लहलहाते जंगल, ऊँचे-ऊँचे पर्वत थे
पशु, पक्षी, निरीह चर सारे, मस्त मगन हो रहते थे II
लेकिन तेरी लिप्सा ने, सबका विनाश कर डाला
वसुधा थी जन्नत सी प्यारी, नर्क उसे कर डाला II
जंगल काट दिए सारे, खुद का विकास करने में
दया तनिक भी न आयी, इनको विनिष्ट करने में II
रहने वाले जीवों को, बेघर तुमने कर डाला
पैसों की खातिर हत्या कर, विक्रय तक कर डाला II
पर्वत सारे तोड़ दिए, भू-तल का क्षय कर डाला
ऐसी तोड़ी चट्टानें, भूकंप इजाद कर डाला II
ऐसी-ऐसी खोजें की, जिनका निमित्त हितकारी
लाभ मगर अब कम है इनसे, ज्यादा ये दुष्कारी II
इन खोजों ने अब देखो, कैसा मंज़र दिखलाया
जीने को, जो भटक रहे, उन्हें मौत से है मिलवाया II
तुमने पैसे की खातिर, मानवता है बिसराई
ऐसे-ऐसे कर्म कर रहे, रोती सकल खुदाई II
मार रहे एक-दूजे को, खून की नदी बहाते
अन्न को खाना छोड़ दिया, अब माँस नोच कर खाते II
काट रहे हो बन कर राक्षस, बेजुबान पशुओं को
लूट रहे हो घर की इज्जत, सरे आम सड़कों पर II
प्रेम भाव जो कभी रहा, उसे स्वार्थ से ऐसे पाटा
मिल जाएगी जॉब सोचकर, पुत्र ने बाप को काटा II
हाँथ पकड़ कर चला था जिसका, गोदी में जिसने झुलाया
उसी जन्म दाता पर तूने, अपना हाँथ उठाया II
हुआ कभी एक चीरहरण था, युद्ध विनाशक देखा
पर जो चीर हरे तन से, अब, उसे राजा बनते देखा II
जिसकी अस्मत लुट जाए, उसे दुनिया कुल्टा कहती
दुनिया उसका रेप करे फिर, न तनिक जो दोषी होती II
कोर्ट, कचहरी, पुलिस ठिकाने, हर जगह दानव रहते
बारी-बारी अबला का सब, बलात्कार फिर करते II
सिसकती रहती मान गंवाकर, न्याय की भीख माँगती
लेकिन पढ़ी-लिखी जनता, तारीख की किश्त बाँटती II
न्याय की चौखट कभी जो थी, अन्याय वहीं पर होता
उच्च शिखर पर बैठ कर मानव, जुर्म को आँगन देता II
मजदूरों, निर्धन का जीवन, धनी का गिरवी रहता
रहे भले निर्दोष वो कितना, पर दोषी ही होता II
भूखे कितने लोग हैं मरते, बच्चे बिन कपड़े के
निम्न वर्ग का खून चूसते, जो माला हैं जपते II
खुद को कहता है तू मानव, सर्वश्रेष्ट, बलशाली
लेकिन नर रूपी कुत्ते का, नहीं है जग में सानी II
जितने सारे कर्म बुरे, वो शायद तू ही करता
लगा दी बोली डोली की, पर पेट तेरा न मरता II
पैसे की खातिर है तूने, तलवे कितने चाटे
हो जाए तेरी तरक्की ऐसी, सोच में जूते खाए II
इतना नीचे गिर है गया अब, मार दिया आँखों का नीर
दौलत की लिप्सा में पड़कर, दे दी तूने रब को पीर II
इससे पहले प्रलय करे, सृष्टि खुद न्याय की खातिर
तू बन जा इंसान ‘सनम’, न बन कोई कातिल शातिर II
अगर नहीं एहसास किया अब, गलत नहीं है करना
सृष्टि ने जो दिया सुधा रस, उसी का संचय करना II
आएगी फिर प्रलय भयानक ,भू होगी मरूस्थल
हाहाकार मचेगी ऐसी, नहीं बचेगा फिर कल II
शायद इसीलिए रहबर ने, अभी जरा चेताया है
बोल रहा है, हे! मानव, तू सम्हल जा, क्यूँ पगलाया है II
मैंने तुझको दी है ऐसी, सर्व शक्तियाँ सुन ले
जीवन जीने की राहें जो, सरस, सरल है चुन ले II
फिर कर दे धरती को जन्नत, जैसे तुझे मिली थी
महका दे फिर कली प्रेम की, जैसे कभी खिली थी II
अपनेपन की खुशबू कली में, दल होंगे मानवता के
फैलेगा उल्लास प्रफुल्लित, मन,हिय,उर,आँगन में II
सदा रहेगा आतुर फिर, नर-भंवर कलीरस पीने में
जीवन में, जीवन होगा, फिर जान रहेगी जीने में II
जान रहेगी जीने में, जीवन जीवंत लगेगा II
फिर सारा भू-तल,अम्बर, अपना घर-द्वार बनेगा II
अपना घर-द्वार बनेगा II
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