खुदा ने कर जतन बेहतर, भू को जन्नत बना डाला

मगर, हमने रच कर साजिश, इसे अब नर्क कर डाला ll

दिया रहबर ने सबको घर, रहे फिर कोई न बेघर

मगर लोंगों की लिप्सा ने, कर दिया सबको अब बेघर ll


कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी बरसात का आलम

कहीं नदियाँ, कहीं पर्वत, कहीं वन-उपवन का संगम ll

मगर इस श्रेष्ठ मानव ने, अलग ही सोच रखी थी

चाहे जो भी हो लेकिन, खुदा से लड़ने की सोची थी ll


दिया, खाने को सृष्टि ने, सबको क्षमता मुताबिक था

मगर कैसे रुके इन्सां, सबसे ब्रिलिएन्ट प्राणी था ll

अपनी शोधों के बल पर, सोचा रब से जीत जाएगा

करेगा, जो भी वो चाहे, कौन उसको हरायेगा ?  


इसी धुन में चला ऐसे, खेल साजिश का कर डाला

चली चालें ऐसी शातिर, चुनौती रब को दे डाला ll

वो भी खामोश, साधे मौन, धैर्य के साथ बैठा था

रही मिलती चुनौती पर, चुप्पी के पल्लू में दुबका था ll


मगर कब तक ? चुप वो रहता, बचाना भी तो जग को था

छेड़ी फिर जंग, अब उससे, रोज जो साजिश करता था ll

किया उसने नहीं कुछ है, मगर उसने कराया है

बना, इंसान को मोहरा, उसकी औकात दिखाया है ll


सदा, प्रति-पल, नित्य, हरदम खोज इंसान करता था

जिसकी टेस्टिंग करने को वो, छोटे जीवों को डसता था ll

देख इंसान की तिकड़म “खुदा ने साजिश” रच डाली

सृजित मानव के विलयन की, उसी पर testing कर डाली ll


खुदा की, एक ही साजिश, मनुज घुटनों पर आया है

नहीं उसका अब कोई बस, दर्द से बिलबिलाया है ll 

जो मानव सोचता था श्रेष्ठ हूँ, हूँ जग का मैं दाता

वो अपनी ही गली में, घुट रहा पर निकल न पाता ll


 सुनो, इंसान, तुम बेबस हुए लाचार हो ऐसे

खुदा को भी पता, शायद ? उत्तर देना, जैसे को तैसे ll

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