प्रीत के हर तार से
सरगम निकलनी चाहिए ।।
दिल में अपनेपन के सारे
गीत बजने चाहिए ।।
यूँ, तो प्रति-दिन शाम में
खुशियाँ संवरनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
प्रेम की मोहक बहारें
सृष्टि का श्रृंगार कर दें ।।
हो प्रफुल्लित नभ-धरा
यूँ,नेह की बरसात कर दें ।।
ऐसी बरसातों से तन-मन
भीग जाना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
हर तरफ बस प्रेम हो
न हो, घृणा की सरहदें ।।
सब में भाई-चारा हो
न हो, स्वार्थ की हसरतें ।।
लालच की आँधी को
कब्रिस्तान मिलना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
हर हृदय-अंदर बसे
मानवता के ही कायदे ।।
जान की कीमत लगा
देखे न कोई फायदे ।।
भूमि की खातिर भाई
की, न हत्या होनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
प्रीत की लोरी सुहानी
फिर से घर, अंगना बजे ।।
तीन पीढ़ियों का निवाला
एक ही चूल्हे पके ।।
बाबा के कंधे, पोते की
सैर होनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
दुःख के पल, आयें कभी जब
न कोई मायूस हो ।।
अश्रु न निकले तनिक भी
आँख न ग़मगीन हो ।।
मेरे सुख और तेरे दुःख
की, अदला-बदली चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
बाप के कर्मों का लेखा
बेटा न माँगे कभी ।।
घर की, बहू-बेटी की इज्जत
गैर न ताके कभी ।।
अब निर्भया के बदन
न पीर होनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
हर मोहल्ले से राम
घनश्याम, की जोड़ी चले ।।
दुर्योधन, दुशासन को
भागे न गलियाँ मिलें ।।
न दोबारा द्रौपदी सा
चीर-हरण चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
लालच की कलुषित महिमा का
आओ हम परित्याग करें ।।
न पैसे का लेन-देन हो
ऐसे कन्यादान करें ।।
न किसी आँगन बहू
अब, जिंदा जलनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
क्या गलत है ? क्या सही ? तुम
अब, इसका निर्धारण कर लो ।।
न मन में पाप रहेगा अब
तन को भी तुम चंदन कर लो ।।
न फूल सी कोमल बच्चियों
का, रेप होना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
घर - घर में अब खुशियाँ छायें
मातम को न ठौर मिले ।।
एक -दूजे से गले मिलें सब
होली प्रति-पल यहाँ खिले ।।
अब औरत की माँग का
न, सिन्दूर उजड़ना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
हर तरफ समरसता और
सौहार्द, की गूँजे खनक ।।
इसके संग करुणा, दया
व त्याग की बस हो महक ।।
अब कहीं न ट्रेन से
मजबूर मरने चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
उन्नति, वैभव, समृद्धि
का, इस कदर आयाम हो ।।
हर गरीब की थाली में
बस खाने का भंडार हो ।।
फिर न सड़कों पर भूखे
मजदूर सोने चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
पशु-पक्षी हर्षे जंगल में
मंगल की नित भोर हो ।।
न टूटे विश्वास कभी
जीवन की ऐसी डोर हो ।।
फिर कभी न भूख से
कोई हाथी मरना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
यूँ, प्रफुल्लित हो धरा
नदियों का जल फिर पावन हो ।।
ऐसे तरुवर हो पल्लवित
हर मौसम फिर सावन हो ।।
न कहीं बिन वृक्ष धरती
बंजर होनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
नफरत की महफिल का
आओ, मिलकर कर दें खात्मा ।।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
सबका एक परमात्मा ।।
न कभी दंगों सा
कत्लेआम होना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
खेल रहे हैं खून की होली
केवल दौलत खातिर हम ।।
लेकिन खाली हाँथ हैं आए
खाली हाँथ मरेंगे हम ।।
पर अब दौलत खातिर न
ईमान बिकना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
सबकी नीयत साफ रहे
न, उसपर लोभ की चादर हो ।।
देश के अंदर और सीमा
पर, वीरों पे न फायर हो ।।
कर लो निश्चय, न, वर्दी पर
अब रंग कफन का चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
विद्यालय है ज्ञान का मंदिर
कुछ तो ज्ञान की बात करो ।।
ज्ञान को न पैसों से तोलो
गुरू जी थोड़ा शरम करो ।।
अब न कभी पढ़ाई पर
जर, जमीन बिकनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
हर बीमार को दवा मिले
पावन अस्पताल के द्वारे पर ।।
बिन पैसे न कोई मरे
न भेजो, उन्हें दुत्कार कर ।।
देवतुल्य तुम, तन से अब
न, किडनी बिकनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
जीवन है ये चार दिनों का
कर्म-चक्र का खेला है ।।
जिसने जैसा कर्म किया है
उसने वैसा झेला है ।।
अब न किसी के घर
अफजल, कसाब पलना चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
'सनम' सुनो अब चलता हूँ
मैं कुछ न लिखने लायक हूँ ।।
अच्छे लोंगो की अच्छाई
देख के रोने वाला हूँ ।।
अब तो बस उम्मीद
हृदय, मानवता दिखनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
बहुत पढ़ी हैं तुमने किताबें
कुछ तो उनका मान करो ।।
धर्म-विरुद्ध जो कर्म सभी हैं
उन सबकी आहुति दे दो ।।
ऐसे ही जग में वो 'सनम'
फिर जन्नत आनी चाहिए ।।
हो "आखिरी शाम" यदि
रंगीन होनी चाहिए ।।
----------@ShashankMy'सनम'


