मैं अकेला
मैं अकेला
वो भी अकेली
बड़े दिनों बाद
जब नजरे मिली
खिल उठी मासूम कली
बड़ी शरारती
बड़ी शर्मीली
कभी इधर आती
कभी उधर जाती
कभी पर्दे में छुप जाती
टुकुर-टुकुर मुझे निहारती
चेहरा बनाती
जीभ हिलाती
गुस्से से आंखें चमकाती
शायद मुझसे कुछ कहना चाहती
बुझ गई जब घर की बाती
धीरे से नजरें मिलाती
अजीबो-गरीब आवाज़ निकालती
कभी इतराती कभी डराती
करती रहती अटखेली
मैं अकेला
वह भी अकेली
समझ में नहीं आई पहेली
बताओ तो जरा कौन है
वो छुपी कली
कोई और नहीं
कोई और नहीं
वो थी छिपकली
वो थी छिपकली
मैं अकेला
वो भी अकेली


