दो गज जमीं ढेर सारा आसमान चाहिए
सबके जेहन में अपना इक निशान चाहिए
थक गए हैं कदम आंधियों से टकराकर
समंदरो से कहो अब कुछ बड़े तूफान चाहिए
किस किस के चेहरे लगाए फिरते हैं लोग यहां
इस शहर में आईनों की एक दुकान चाहिए
चिल्लाकर कहोगे बात तो कोई न सुनेगा
समझाकर कहें उसके लिए इंसान चाहिए
- विकाश शर्मा

