सच्चे आशिक़ को यूँ सताना,
ये कोई अच्छी बात नहीं,
बार बार यूँ तडफाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
साँवली सूरत, आंखों पे चश्मा,
अजगर सी तेरी जुल्फे घनी,
वो नन्हा सा सुन्हेरा पिम्पल आना,
फिर बन ठन के यूँ मटकाना ,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
मिलकर भी, हम, मिल नहीं पाते,
दूरिया सिमट नही पाती,
ऊपरवाले की वो गुदगुदिया,
वो तेरा आना, तभी मेरा जाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
वादा था वो मिलने का,
आना था दिल्ली तुमको,
वादा करकें फिर ना आना,
फिर पूरे सावन यूँ तरसाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
कहतीं हो तुमको प्यार नहीं,
तुम को हम पर एतबार नहीं,
फिर झूठा गुस्सा दिखलाना,
और मन ही मन मुसकाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
कहती हो तुम कौन हों मेरे,
जो अपने अपने सें लगते हों,
पगली क्या समझाऊँ तुझको,
वो पिछलें सात जन्मो का अफसाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
ये किस दुनिया सें डरती हो,
झूठी है ये, खुदगर्ज बड़ी,
फिर झूठी दुनिया के बहकावे में,
सच्चे आशिक़ को यूँ ठुकराना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
हाँ कह दो, सिर्फ हाँ कह दो,
अब ना हमको मंजूर नहीं,
पलकों पे बिठा के रखेंगे,
तेरे सपने हैं मेरे अपने सभी,
अब अपने आशिक़ को यूँ तड़फाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।
सच्चे आशिक़ को यूँ सताना,
ये कोई अच्छी बात नहीं,
बार बार यूँ तडफाना,
ये कोई अच्छी बात नहीं,
ये कोई अच्छी बात नहीं।।