कभी जो चाहा हो ,कभी जो माँगा हो 

 बिना कहे भी मिला जो हो 

 यह वरदान पितृत्व ही तो है 


 शांत , अविचल , प्रज्ञा, संवेदी 

 नीलकंठ का वर्तमान ,

 यह प्रतिरूप पितृत्व ही तो है 


 संतान की आकांक्षाओं में 

 स्वयं की संतुष्टि , स्वयं का वैभव 

यह अभिलाषा पितृत्व की तो है !


 ज़ब कभी कहीं सवाल उठे 

 बच्चों की वेदना में , 

 संहारक का स्वरूप धरे 

 यह साहस पितृत्व ही तो है । 


ख़ुद की तकलीफ़ों में अजनबी

 ख़ुद की ख़ुशियों से अदृश्य 

 क्या कुछ करें जो औरों का काम फले 

यह लक्ष्य पितृत्व ही तो है 


 मृदु , स्थिर , अभिज्ञ से अनभिज्ञ 

मृत्यु शैया में भी सुदृढ़ साहस 

 कुछ दिन मिले तो कुछ और करूँ 

बच्चों का मैं संबल बनूँ 

ऐसा स्वार्थ पितृत्व ही तो है ।


 ज़ब ज़ब उन्हें देखें , ऐसा साहस भरे 

असंभव सा लक्ष्य, नीर की सरलता बने 

 आज़ हर क्षण एक शून्य बना है 

 इस शून्य में क्या ही निहित है 

 पिता का अर्थ , समग्र शिव ; 

 जीवन का अर्थ पितृत्व ही तो है ।