ज़िंदगी का सफ़र यूँही चलता रहता है जैसे होती रेलगाड़ी,
वक़्त के संग दौड़ लगती पल-पल यूँही बनाती नई कहानी!
आते जाते बस हर मुसाफ़िर को वो ले जाती है वो रेलगाड़ी,
हरउम्र के संग बन रहीं तज़ुर्बे की हमारी ज़िंदगी की कहानी!
खट्टे-मीठे अज़ीब नए-नए पलों की ही बनती है हमेशा रेलगाड़ी,
ज़िंदगी भी है कभी प्यार भरी तो कभी होती जुदाई की कहानी!
हर मौसम में रह कर दौड़ लगती और मंज़िलों पर पहुँचाती है रेलगाड़ी,
इसी तरह ख़ुद में हम हिम्मत से बनाते जिंदगी के मंज़िल की कहानी!
मुसलसल चलती रहती यूँही 'शहाबिया' की ज़िंदगी और वो रेलगाड़ी
कभी न रुकती चलती सीखती सब्र से बस बनती हर उम्र की कहानी!
©शहाबिया ख़ान
