लॉकडाउन के इस सफर में
आ गई मैं एक बार भंवर में
घर अपना छोड़कर
तपोभूमि जैसे कर्मठभूमि में
गांव का ये वृतांत, कैसे मैं अब तुम्हें दर्शाऊ
जो शहर की थी वासी
गांव में अब समय बिताती।
यहां का यापन मेरे लिए बड़ा अचरज है
कैसे बताऊं यहां का हाल,जहां सब कुछ है बेहाल
भोर भई यहां कुछ नई सी
अलार्म क्लॉक से पहले उन पक्षियों की चहचहाहट सी
सूरत आया आंगन में रोशनी लेकर
आंखों में की गुदगुदी सुबह जल्दी उठा कर ।
वो काम यहां है सबसे ज्यादा
काम करते-करते हारा
दिन-रात भी यहां काम करते रहो
फिर भी नहीं होगा काम खत्म तुम्हारा
वो अनाज की कट्टी और चूल्हे की भट्टी
गर्मी की लपटें और सर्दियों की ठंडी
सब बहुत फेमस है यहां।
खेती-किसानी का काम यहां
गुड्डे गुड़ियों का खेल यहां
रानी जहां पर्दे में रहती
राजा का है राज यहां
वह तेज धूप ने जी मचलाया
लाइट ने भी अपना रुख दिखलाया
बिजली की तो बात ना पूछो
पल-पल जाती हाय गर्मी ने मारा।
लाल सूरज ढलने लगा,यह शाम की शीतलता खिल उठी
फूल पत्ती और फसलें, हवा सी मस्तानी झूम उठी
ये शाम अनोखी ढलने लगी यह रात सुहावन आ उठी
यह चांद की कोमलता से मानो
राहत हमको मिलने लगी
वह सोना उन सितारों के नीचे, उस चांद को निहार कर
पेड़ों की डालियां झूमे, कुदरत के करिश्मे दिखाकर
लो झपकी अब लग गई, उस मस्तानी सी हवा में
सबसे अच्छा पल जहां है, रातों की हवा में
यह पल बीत जाएगा यह सोचकर चुप हो जाती हूं
लॉकडाउन तक की तो बात है
चलो क्वॉरेंटाइन हो जाती हूं।


