अंतरीक्ष भेदकर , पयोधि को भी घेरकर, 

नगपति को छेदकर,फलक को भी समेटकर,

जो चल दिए थे हे मनुज! कहाँ पे तुम ठहर गए?

न अस्त्र से, न शस्त्र से, न यंत्र से, न मंत्र से,

      सूक्ष्मातिसूक्ष्म तंत्र से, हे मनुज, क्यूँ डर गए?


करो विचार आर्य तुम! कहाँँ पे हो भटक गए?

या निज हवस के जाल में ही तुम स्वयं उलझ गए?


भोजन, वसन वसुंधरा ने था स्वयं लुटा दिया,

रहे तू स्वस्थ इसिलए प्रकृति को खिला दिया,

पेट अपना चीरकर, खनिज-लवण लुटा दिया,

रहे बना यह चक्र सो, ऋतु को भी चला दिया,

     विध्वंस का प्रयोग फिर भी कर रहे थे नित नए!


करो विचार आर्य तुम! कहाँ पे हो भटक गए?

या निज हवस के जाल में ही तुम स्वयं उलझ गए?


अतल धरा को खोदकर, पर्वतों को तोड़कर,

सघन वनों को नोचकर, धारें नदी के मोड़कर,

कई प्रजाति नष्ट कर 'औ कंकड़ों को जोड़कर,

नये शहर बसा रहे, कृत्रिम मनुज बना रहे,

      निर्माण सभ्यता की थी, सर्वत्र ध्वस्त कर रहे!


करो विचार आर्य तुम! कहाँँ पे हो भटक गए?

या निज हवस के जाल में ही तुम स्वयं उलझ गए?


धरा थी तप्त हो रही, सरिता लुप्त हो रही,

पवन अशुद्ध हो रही, सकल मही थी रो रही,

सुनामी के थी रूप में, शहर-शहर डूबो रही,

सृष्टि के ही अंत की तैयारी में थे तुम रहे,

       प्रलय का ही आगाज़ था, जो तुम नहीं थे सुन रहे!


करो विचार आर्य तुम! कहाँ पे हो भटक गए?

या निज हवस के जाल में ही तुम स्वयं उलझ गए?


बहुत हुआ धरा-दलन, मनुज-दलन की बारी है,

चाल अपना हो गया, प्रकृति की ये पारी है,

सको अगर तो रोक लो, जो फैली महामारी है,

हाय, विकास-व्यूह ये, पड़ी अत्यंत भारी है,

       दिनों में ही, दशक कई , तुरंत हम पिछड़ गए,

       

हाँ, निज हवस के जाल में, हैं हम सभी उलझ गए।

हाँ, निज हवस के जाल में ,हैं हम सभी उलझ गए।