सौ से बड़ा दस!
कभी-कभी छोटी घटनाओं का सूक्ष्म अवलोकन भी बहुत ही बड़ा संदेश दे जाता है। ऐसे ही एक सूक्ष्म अवलोकन का अवसर अनायास ही एक दिन मुझे भी प्राप्त हुआ।
मंदिर का स्थापना दिवस, यहाँ पर भंडारा कर के मनाया जा रहा था। सभी आ कर प्रसाद खा रहे थे और यथाशक्ति जितनी इच्छा हो, जाकर मंदिर के अंदर पैसा चढ़ा जा रहे थे।
मैंने प्रसाद लेकर जैसे ही खाना शुरू किया, बगल में बैठे तीन बच्चे जो कि लगभग 7-8 साल के बीच के रहे होंगे, उलझ पड़े। उनमें जो सबसे छोटा था वह रोने लगा। हम सब बस चुप करा रहे थे और प्रसाद खा लो, यह कह कर समझा रहे थे।
एक सज्जन जो कि घूम-घूम कर पंगत में बैठे लोगों को खिला रहे थे, पास आए। आकर उन्होंने, बच्चों से, उसके रोने का कारण पूछा।।
बच्चे ने खु़द ही रो-रो कर बतलाया कि उसके पास दस रुपये का एक नोट था, जो इन लोगों ने छिन लिया।उन्होंने उन बच्चों से पुछा तो उन्होंने बताया कि उनकी मम्मियों ने उन्हें ये दस के नोट मंदिर में डालने के लिए दिया है, और वह हमारा है।
दस के दो नोट और दावेदार तीन!
संभवतः वो तीनों ही अपने नोटशक्ति का प्रदर्शन करते हुए आ रहे होंगे और किसी एक का नोट कहीं गिर गया होगा और फिर, प्रकृति के नियम ने अपना काम किया होगा….. सामर्थ्यवान की जीत हुई…… शक्तिशाली नोट लेकर बैठ गए। छोटू मियां कमज़ोर पड़ गए होंगे… रोने लगे…..।
न्याय करना तो मुश्किल था उस भीड़ में।
गिरते हुओं को, रोते हुओं को…खा़सकर जब इन क्रियाओं का कर्ता कोई बच्चा हो, तब हममें से अधिकांशत: हँसते हैं। वहाँ भी अधिकतर लोग हँस रहे थे। इक्के-दुक्के ही रहे होंगे जो उसे समझा रहे थे। परंतु, वह बच्चा लगातार रोया ही जा रहा था। तभी उन खिलाने वाले महाशय ने अपनी जेब टटोला और दस का नोट निकालते हुए कहा-” अरे! यह तो गलती से मेरे पास आ गया था, ये ले अपने पैसे और खुश होकर खा।”
बच्चे के गाल आँसूओं से सने थे और आँखें बरस-बरस कर लाल हो गई थीं। परंतु, फिर भी वह दस का नोट देख कर अचानक से चहक उठा, आँखें चमकने लगीं।
जो अबतक पूरी-हलवा की तरफ देख भी नहीं रहा था, अब नोट लेकर मुस्कुराते हुए खाने लगा।
दस का नोट कोई बड़ी चीज़ नहीं थी, लेकिन वो बच्चे चुकि वहाँ पास की झुग्गियों के थे, इसलिए इतनी दिलदारी दिखलाने की बात किसी के मन में भी नहीं आई थी। हो सकता है, हमारी कालोनी वालों में से किसी का बच्चा होता तो हमारा भी दिमाग़ काम कर जाता। लेकिन, सामर्थ्य विहीनों का कोई मददगार नहीं होता।
उन महाशय की हाज़िर-दिलदारी से मन उनके प्रति नतमस्तक हो गया और वह ‘दस’ का नोट जो उन्होंने बच्चे को दिया, अचानक मुझे अपने द्वारा मंदिर में चढ़ाए गए ‘सौ’ के नोट से कहीं ज्यादा मूल्य का लगने लगा।
मुझे ऐसा लगा कि मैं मंदिर के दानपात्र में घुस गई हूँ और वहाँ वह दस वाला नोट, मेरे सौ वाले नोट को अंगूठा दिखा-दिखा कर चिढ़ा रहा है।
----- ( शान्ता )


