राहों में पड़ती सभी शिला, हे राघव! बस छूते जाओ।।
ना जाने कब कौन इनमें, बन अहिल्या जागेगी!
ना जाने कब कौन स्पर्श, किस हतभागी को तारेगी!
कर ध्वस्त अभिशाप, ना जाने, कब मानव रूप को धारेगी!
राहों में पड़ती सभी शिला, हे राघव! बस छूते जाओ।।
--शान्ता


राहों में पड़ती सभी शिला, हे राघव! बस छूते जाओ।।
ना जाने कब कौन इनमें, बन अहिल्या जागेगी!
ना जाने कब कौन स्पर्श, किस हतभागी को तारेगी!
कर ध्वस्त अभिशाप, ना जाने, कब मानव रूप को धारेगी!
राहों में पड़ती सभी शिला, हे राघव! बस छूते जाओ।।
--शान्ता