प्रति वर्ष पद्म पुरस्कारों की घोषणा होती है, तो कई नाम ऐसे होते हैं जिन्हें मरणोपरांत पुरस्कृत किया जाता है। इन नामों को देखकर मुझे गोपाल दास ‘नीरज’ जी की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं,

कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे…….

जब तक जीवित रहे, हमने उनकी प्रतिभा को बस देखा, और जब नहीं रहे तब जाकर उन्हें सम्मानित किया, जिसका उन्हें कोई भी फायदा नहीं होता।

किसी भी क्षेत्र में पुरस्कार देने का अर्थ होता है अमुक व्यक्ति की कला/प्रतिभा को सम्मान देना।उस व्यक्ति को सम्मान प्रदान करने के कई फायदे होते हैं जिसमें प्रमुख हैं(मेरे विचार से)

* अमुक व्यक्ति को उसके कलात्मकता के लिए एक पहचान स्थापित करना, जिससे कि वह व्यक्ति स्वयं उत्साहित हो( यह बात अलग है कि कई व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिनके पास जाकर पुरस्कार स्वयं पुरस्कृत हो जाते हैं)।

*किसी के पुरस्कृत होने पर अन्य लोग उस कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित हों तथा उसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हों। इससे कलाकारों की गुणवत्ता और अधिक प्रेरित होती है।

एक निश्चित समय बाद अथवा मरणोपरांत पुरस्कृत करना, उनके लिए खास अर्थ नहीं रखता।

यदि कोई लगन से किसी ख़ास क्षेत्र में अपनी योग्यता को तपस्या की तरह दिन-रात एक करके, प्रयत्नशील होकर करता है, तो उस कार्य के लिए पुरस्कृत होनेपर स्वयं वह जितना खु़श होगा, उतना और कोई नहीं हो सकता।

मरणोपरांत पुरस्कार न देकर यदि वही पुरस्कार उसी क्षेत्र में प्रयत्नशील योग्य व्यक्ति को दिया जाए तो मुझे लगता है उसका प्रभाव उसपर ज्यादा पड़ेगा। उसे कई और लोग जानेंगे, उससे कुछ सीखना चाहेंगे, उसकी ख्याति बढ़ेगी। हमारे देश में कई प्रतिभाएँ ऐसी होती हैं जो आर्थिक तंगी से गुज़र रही होती हैं। ऐसे में उसे आर्थिक रूप से मदद भी मिलेगी।

रक्षा-क्षेत्र को इस मामले में हम अलग रखेंगे।

मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को हमने भारत-रत्न से सम्मानित किया, लेकिन कब? बहुत देर से, तब, जब उनकी जिंदगी में पुरस्कार का कोई खा़स मतलब नहीं रहा।

अपनी इस टीस को उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में निकाला भी। उनका कहना था कि पुरस्कार वगैरह तो सब ठीक है, परन्तु कुछ उचित राशि मिलनी चाहिए थी। मतलब साफ है कि उस पुरस्कार से उन्हें कोई ख़ास प्राप्त न हो सका। अर्थात, समय पर यदि उन्हें नवाजा गया होता तो शायद उन्हें आर्थिक मदद तो ज़रूर मिल गया होता राशि न मिलने के बावजूद! उनके शिष्य बढ़े होते।

ऐसे कई और उदाहरण भरे पड़े हैं।

मरणोपरांत पुरस्कार देकर हम फिलवक्त कार्यरत किसी और प्रतिभा को नजरअंदाज करते हैं।

पुरस्कार जीवित व्यक्ति को उस समय देने की व्यवस्था हो, जिससे उन्हें अपने जीवन जीने में इसका कुछ उपभोग हो सके, ना कि उम्र जी लेने के बाद।

शुरुआत हम अभी से करें तो अच्छा होगा।

  • जो बीत गई……….वो बात गई…

--शान्ता