कभी धरा, कभी गगन,
भटक रहा, चमन-चमन,
कभी धरा के गर्त में,
कभी ग्रहों के मध्य में,
संभल-संभल, बहक-बहक,
विचर रहा “अक्षुण्ण” ‘मन’
कभी छुपा रहा अनंत
भाव अपनी ‘सोच’ में,
कभी खुले, प्रकट करे,
छिपे सभी जो ‘ओट’ में,
अजब गति निर्बाध्य से,
परकोटे के भी पार से,
अभेद्य सारी राह से,
चला चले “अक्षुण्ण” ‘मन’.
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-- शान्ता


