हूजूमों के कारवां को कहीं जाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


मीलों के सफ़र पर, पैदल ही जाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


हाथ में गठरी और बेबस वृद्धों को ले जाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


किसी को सड़क तो किसी को पटरियों पर सो जाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


रोटी-पानी के मोहताजों को, जान गँवाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


घर जाने को, लाखों को छटपटाते देखा है,

मैंने बँटवारा नहीं देखा है।


बेबस होकर सूखे आँसूओं वाला नयन देखा है,

मैंने-कोरोना काल मेंं श्रमिकों का पलायन देखा है। 





-- शान्ता