कबीर .....एक वो चिंतक थे जिनकी सोच ने, शब्दों के माध्यम से एक वैसे व्यक्ति को भी अध्यात्म का स्वाद लगाया, जिसकी कल्पना में रोटी-पानी के जुगाड़ के सिवाय कुछ भी नहीं होता है...
कबीर का सवाल अनोखा और लाजवाब होता और उसका जवाब तो सवाल से भी सुंदर और सटीक..
एक ऐसा ही सवाल-जवाब जो मुझे काफी प्रभावित करता है...
चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच मां, साबत बचा ना कोय।।
अपने इस दोहे के बारे में स्वयं कबीर आगे कहते हैं....
चाकी-चाकी सब करैं, कीली कहे ना कोय।
जो कीली से जा लगो, वा को बाल न बिंका होय।।
-शान्ता


