राधा -“हे कृष्ण !क्यों सिर्फ मैं ही? अन्य गोपियाँ भी हैं । कुछ तो अद्वितीय हैं।”
कृष्ण का उत्तर……..
सचमुच में प्रेम बड़ा निर्मल है गोपिन का,
सहज, समर्पित, जैसा तेरा, वैसा उनका,
मैं भी बहुधा, घिर जाता हूँ भंवरों में,
प्रेम समर्पित उनमें देखूँ, या तूझमें?
सर्व हृदय में, स्वयं को ही जब पाता हूँ,
सच कहूँ, सखी मैं भी चकरा जाता हूँ…
क्यों किया प्रेम तूझसे? स्वयं दोहराता हूँ,
उत्तर इसका, मैं आज तूझे बतलाता हूँ….
प्रतिबिंब, सखी, तो कई जगह बन जाते हैं,
जल पर, पथ पर यह अनायास दिख जाते हैं,
जल छेड़ो तो, यह बिंब कहीं घुल जाती है,
बस, एक अंकड़ी को…भी सह नहीं पाती है,
पथ का बिंब तो बस मरीचिका ही है सजनी,
उस भ्रम को, सत्य समझ कर,भूल नहीं करनी,
मैं बसा हुआ हूँ, गोपियों के चित्त में भी,
पर बने बिंब जल पर, जैसे, बस वैसे ही,
एक व्यंग अंकड़ी, जब भी उनपर पड़ती है,
फिर कई तरंगें बिंब मेरा ले उड़तीं हैं,
फिर देख नहीं मैं स्वयं को वहाँ पाता हूँ,
मन ही मन मैं भी, विचलित सा हो जाता हूँ,
तेरा हिय तो, हे राधे! बस ऐसा है,
सरल, निश्छल, निष्पाप और दर्पण सा है,
व्यंग कंकड़ी जब भी इस पर आएगी,
जब इसे, कई टूकड़ों में कर जाएगी,
मैं उतने ही टूकड़ों में, खु़द को पाउँगा,
उन सब में, अलग स्वयं को, मैं दोहराऊंगा,
तुझमें मेरी बस व्यापकता ही दिखती है,
तुझसे मेरी यह रूप-राशियाँ बढ़ती हैं,
मेरा विश्वास, मेरा सम्मान बढ़ाती हो,
मेरे हरि-भाव को तुम ही सदा जगाती हो,
फिर प्रश्न कहाँ उठता, प्रेम गोपि से हो?
तुम्हीं संगिनी मेरी, तुम्हीं सहोदर हो।।
मेरी कलम से………..
शान्ता पांडेय


