सामान्यतः सभी मनुष्यों के जीवन की धूरी का केंद्र 'स्वयं' ही होता है।

हम स्वयं के लिए 'अर्जन' करते हैं, स्वयं के लिए 'व्यय' करते हैं और स्वयं के लिए ही 'संचय' भी करते हैं। आजकल के तथाकथित "मतिमान" लोगों के लिए आय, व्यय या संचय का सीधा तात्पर्य सांसारिक 'अर्थ' से ही होता है।

यदि कोई भी इस आय, व्यय और संचय का अर्थ ज्ञान से या आध्यात्म से जोड़ता है, तो उसे संदर्भित विषय न मानते हुए, हम मुख्य धारा से अलग व्यक्ति की संज्ञा दे देते हैं।

यूं तो हमारे धर्मग्रंथों में इस 'स्वयं' को तोड़कर 'वयम्' तक पहुंचाने के कई प्रयास बतलाए गए हैं,और इसकी व्याख्या भी अत्यंत सुंदर शब्दों और उदाहरणों के साथ अनुकरणीय सिद्ध की गई है। परन्तु, इन व्याख्यानों को सामान्य मति के लोगों तक पहुँचाने के लिए हमें माध्यमों की आवश्यकता पड़ती है।

" कबीर " एक ऐसी सोच थे, जिन्होंने अपने आध्यात्म का सरल शब्दों में निष्पादन किया। जिसकी वजह से यह ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के ही पास एक साथ और एक ही अर्थ के साथ पहुंचा।

कबीर उदार थे। जिससे कि, उन्होंने जब भी सोचा, सब के लिए सोचा। उनकी सोच, उनकी चिंता , सिर्फ अपने लिए ही ना सिमटकर, सबके लिए थी।

उन्होंने हमेशा ही अपने अंदर के स्वयं(स्वार्थ) को हटाकर वयम्(व्यापकता) को स्थापित करने की वकालत की। उनके कुछ दोहे जो खासकर उनके इस सोच को परावर्तित करती हैंं........


1. कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सब की ख़ैर,

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।

स्वयं के साथ-साथ वयम् की खै़र मनाने वाले ये वो सोच थे , जिन्हें सदियाँ बीत जाने पर भी हम जिंदा रखने की क़वायद करते हैं।



2. साईं इतना दीजिए, जामे कुटूंब समाय,

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाए।।

हमारे कबीर को अपनी चिंता तो थी, लेकिन साथ ही अपने दर पर आने वाले उस फक़ीर की भी चिंता उतनी ही थी, कि वह भूखा ना लौट जाए।



3. 'हर' मरे तो 'हम' मरें, और हमरी मरे बलाए,

सांचे कुल का बालका, सो , मरे न मारा जाए।।

कबीर समझते हैं कि समाज में फैली सारी अव्यवस्थाओं में, सबसे बड़ा एक कारण है 'मजहब'। इसलिए उनका कहना है कि इस अलग-अलग ईश्वर के संचालन व्यवस्था को नकार दो तभी हमारी परेशानियाँ समाप्त होंगी। ईश्वर एक ही है। यही सत्य है,और इसी सत्य को आत्मसात करके मानवता अमर होगी। अन्यथा यह मरती ही रहेगी। मेरा ईश्वर, तेरा ईश्वर छोड़ो। हमारा ईश्वर ....का विश्वास बनाओ।



4. भला हुआ मोरी गगरी फूटी,

मैं पनीया भरन से छूटी रे,

मोरे सर से टली बलाय....

मेरे मैं( अहम्, स्वयं) की गागर, जिसमें की सारे कष्टों का पानी भरा हुआ था, टूट गया। अच्छा हुआ जो यह बला मेरे सर से टल गई। अब मैं, इस स्वार्थ परक विषयों से उपर जा चुका क्योंकि मैंने स्वयं के भाव को त्याग कर वयम् तक का सफर प्राप्त कर लिया है।


5. कबीरा कुंआ एक है, पानी भरैं अनेक,

भांडे ही में भेद है, पानी सब में एक।।

सभी एक हैं,स्वयं के भाव को नकारो और सर्व समाना भाव के साथ जीओ और बढ़ो।



सत्य ही कहा है किसी ने....

शेख़, ब्राह्मण, मुल्ला, पांडे..... सब हैं इक मिट्टी के हांडे....

कबीर को समेट तो नहीं सकते हम चंद पंक्तियों में , हाँ, इन पंक्तियों को यदि झाड़ू बनाकार हम 'स्वयं' को समेटने का प्रयास करें, तो, शायद हम 'वयम्' तक के सफर की शुरुआत कर सकें।




मेरी कलम से

शान्ता