छाया है उन्माद बड़ा ही जाने... कौन स्वर्ग लेने को?
मन विषाद से भर-भर, छलक रहा अज्ञात छूने को !
अति द्रवित मै, मुद्राओं से भरी पेटिका....लेकर भी क्यूँ अति दुखित मैं?
सभी 'विशेषण' भी युत् हूँ, फिर भी.....संज्ञाहीन सी क्यूँ मैं?
नहीं है मिलती 'चरम' खुशी किसी अभीष्ट के पाने पर भी,
नहीं है होता 'हृदय-क्रंदन' किसी ईष्ट के जाने पर भी?
है कौन अवस्था जीवन का यह........
क्या मति जग से 'विरत'हो रही?
या फिर 'क्षय' मेरी बुद्धि की....
शनैः-शनैः है निरत हो रही?
नहीं-नहीं......
हूँ नहीं एक मैं, इस रुग्णता की शिकार,
कई-कई......
हैं मुझे दिख रहे, इसी रोग के ग्रसित,बिमार।
- शान्ता


