मैं कांग्रेस और भाजपा नहीं जानती।जानती हूँ, तो बस उस सोच को जो भारत की भारतीयता को,उसके संस्कारों को अक्षुण्ण रखे।आधुनिकता के नाम पर महंगे कपड़े पहनकर हल्के बयान देने वालों के बदले मैं उसका अनुसरण करना पसंद करूँगी जो कुर्ते-पजामे में जाकर विश्व के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति से भी उस आत्मविश्वास से मिलता है, जो करोड़ों के सूट-टाई पहनने वालों के पास भी ना हो। आज तक जो गमछा गँवारूपन का प्रतीक था, उनके आह्वान पर आधुनिक बन गया।

बात गमछे और टाई की नहीं।बात अपनी मिट्टी से जुड़ी चीजो़ं को, संस्कारों को बढ़ावा देने की है। पिछले मन की बात में उन्होंने बातें की थीं हमारे उन देशज खेलों के बारे में, जिन्हें खेलकर हम बड़े हुए। गाना-गोटी, लट्टू, कित-कित और न जाने ऐसे कितने खेल हैं जो भारत में पीढिय़ों से चले आ रहे हैं परन्तु, अब पश्चिमी प्रभाव के कारण गुमनामी के कगार पर हैं।ऐसा नहीं कि इन्हें जानने वाले लोग नहीं हैं। ऐसा इसलिए, कि हम नहीं चाहते कि हमारा बच्चा इन खेलों को जाने। इसलिए हमने इसे अपनी अगली पीढ़ी को दिया ही नहीं।

हमारी भी बहुत सारी भाषाएँ, प्रथाएँ ऐसी हैं, जिनको की विकसित देश ग्रहण कर सकते थे, पर नहीं किया।उन्हें विश्वास है अपनी भाषा, सभ्यता, प्रथा पर जिसकी वजह से हम उनका अनुकरण कर रहे हैं।आज यदि वही विश्वास हम हिंदुस्तानीओं के मन में अपने धरोहरों के प्रति हो, तो अवश्य ही अन्य देश हमारा भी अनुकरण करेंगे। कोई अनुकरण ना भी करे, तो कम से कम इतना फायदा तो ज़रूर होगा कि हमारी भारतीयता लुप्त होने से बच जाएगी।

कई बेवकूफ लोग भारतीयता और हिंदुत्व को एक साथ जोड़ देते हैं। ऐसा शायद इसलिए कि उनका ज्ञान अधूरा है। आज यदि सरहद पर लड़ाई होती है तो उसमें शामिल शहीदों में मुसलमान भी होता है। फिर, क्या मुसलमान भारतीय नहीं? शहादत से भी बड़ा कोई सबूत हो सकता है अपनी भारतीयता साबित करने का?

ऐसे लोगों को भारतीयता समझनी हो, तो आ जाऐं हज़रत निजामुद्दीन के दरगाह पर बसंतोत्सव का धूम देखने।

हिन्दु-मुसलमान को दो ध्रुव समझने वालों को यह जान लेना चाहिए कि जिस जिन्ना ने मुसलमानियत में कट्टरता का बीज अपनी महत्वकांक्षा के लिए बोया, उसके भी रग़ों में हिंदू का रक्त बहता था( जिन्ना की माँ मीठीबाई एक हिन्दू राजपूत थीं)।

भारत निस्संदेह एक हिंदू बहुल राष्ट्र है। यहाँ का इतिहास यह बतलाता है कि कई धर्म यहाँ प्रचार तथा लूट की नीयत से आए और पनपे। यहाँ के हिन्दू धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किए गए। आज भी यहाँ के अन्य धर्मावलंबी उंगलियों पर बैठकर गिन सकते हैं कि किस पीढ़ी से उनका धर्म बदला।

सभी एक ही हैं।

आपके बाड़े में लगा पेड़ यदि किसी पड़ोसी के घर की ओर अपनी डालें फैलाकर बढ़ता और फलता है, तो आप उससे दुखी होते हैं? आपका पड़ोसी दुखी होता है? कोई नहीं। आप खुश होते हैं कि आपका पेड़ दूर-दूर तक फलित हो रहा है, और पड़ोसी फल खाकर खुश होता है।

मैं विशुद्ध ब्राह्मण हूँ और फ़क्र से कहती हूँ कि अपने सहकर्मी के अब्बू के हाथ की बनाई हुई सेवई हर ईद में बड़े शौक़ से खाती आई हूँ। मेरी सहकर्मी ने मेरा इतना ध्यान रखा कि मेरे कारण कभी मांस आदि से बनी चीज़ें टिफिन में नहीं लाईं। यदि, कभी किसी के विशेष आग्रह पर लाईं भी तो दूर एक कोने में रखा और मुझे बतला दिया। इन बातों का इतना ध्यान मेरी किसी हिन्दू सहकर्मी ने नहीं रखा।

यह है भारतीयता, धर्म-सहिष्णुता।

आज भारतीयता को धर्मांधता का पर्याय बना डाला है कुछ चंद लोगों ने, और उन्हीं लोगों ने अपना मतलब साधने के लिए राजनिति को भी धर्म से जोड़ रखा है।

ऐसे लोगों को हमारे प्रधानमंत्री की गहराई समझ में आ ही नहीं सकती क्योंकि उनके दिमाग़ का स्तर ही उनको समझने लायक नहीं।

एक आग्रह करती हूँ उन सारे भारतीयों से कि जो उद्धारक है, उसकी क्षमता के महत्व को विवेकशील होकर समझें तथा उसकी इस क्षमता से लाभान्वित हों। यह समझने की कोशिश करें कि आजतक हमारा उत्तर-पूर्व भारत जो कि अपेक्षित था, वहाँ सड़कें क्या सिर्फ हिंदू के लिए बन रही हैं? आज उत्तरी सीमा पर जो बीहड़ पर्वतों के बीच जो सड़कें बन रहीं हैं जिन्हें देखकर चीन बौखलाया हुआ है, क्या सिर्फ हिंदू के लिए बन रही हैं? आज स्वदेशी और लोकल उत्पादों को जो बढ़ावा दिया जा रहा है, क्या सिर्फ हिंदू के लिए है? क्या मेक-इन-इंडिया का फायदा सिर्फ हिन्दू को होगा? पहले जिस गरीबों के लिए सरकारी फंड से अधिकारियों की जेबें मात्र भरतीं थीं, खाता खुलवाने क बाद सिर्फ हिंदुओं के लिए लाभदायक हैं?

निश्चय ही, विकास सबका होगा तभी देश का होगा , और यह तभी होगा जब सब साथ होंगे।

हम सभी भारतीय अपनी-अपनी धर्म और संस्कृतियों को अक्षुण्ण रखते हुए घुल-मिल जाऐं तथा अपनी भारतीयता को जगाऐं न कि धर्मांधता और कट्टरता को।

मेरी कलम से,

शान्ता