चलते…..चलते…… उड़ने लगी…..,
उड़ते…..उड़ते…..पेड़ों से ऊपर……।।
पंख मिले थे… उल्लास जगा था……
और उपर…. टावरों से ऊपर………।।
और उड़ी………बादलों से भी ऊपर…..
ऊपर.. ऊपर…….और …..ऊपर…..।।
पृथ्वी की चीजे़ं पुंज सी दिखने लगीं….और ऊपर…..
धरती दिखनी बंद हो गई… अब.. यहाँ से पृथ्वी अर्द्धपुंज सी दिखने लगी।
अंधकार घिरने लगा……..और ऊपर……….।सर्वत्र अंधकार……!!! कुछ भी नहीं……!!!
बहुत समय घुमी…….घुम-घुम कर थक गई… । कितने दिन घुमी…पता नहीं?
कैसे गिनती? ना सूर्योदय…. ना सूर्यास्त…!
दूर-दूर अंधकार….. ना बारिश, ना फुहार…!
ना बसंत की कोई बहार……….!!
कौन थी मैं? कहाँ आ गई थी? क्या अस्तित्व था मेरा?
घबराकर उतरने लगी….नीचे-नीचे….और नीचे….
धीरे-धीरे तारे दिखाने लगे…..और नीचे….ग्रह दिखने लगे..।।
और नीचे ….कुछ अर्द्धपुंज सा दिखा…पृथ्वी थी…. उधर ही …और नीचे….
थोड़ा उजाला भी दिखाने लगा…और नीचे उतरी….टावर दिखने लगे..
और नीचे…….उतरती ही गई……..।।
चिड़िया दिखने लगी….पेड़-पौधे भी……सभी दिखने लगे…।।
सूर्योदय का समय था….घर दिखा… पड़ोसी दिखे…..।।
जब सारे दिखने लगे, तब अपने होने का एहसास होने लगा…..और लगा मैं कौन हूँ।
अब समझी मैं कौन हूँ…..
अब समझ चुकीऔरों में ही, स्वयं के होने का एहसास होता है… अकेले होने पर… और…बहुत ऊँचाई पर, सब छूट जाता है…सबकुछ…।नीचे आकर ही स्वयं को ढूंढा जा सकता है, वर्ना व्योम…. में शून्य ….में भटकते रह जाऐंगे……….
मेरी कलम से….
शान्ता…..
