तब एक ही रावण भारी था,अब सोचो अपनी व्यथा हरी।।सैकड़ों स्वच्छंद विचरते हैं,रक्षित कैसे कोई नारि?अवतरित पुनः हो हे राघव!कि रहें निराभय हो सारी,हम वानर -सेना बन जाएँ,जब तुम आओ हे त्रिपुरारी।।
तब एक ही रावण भारी था,अब सोचो अपनी व्यथा हरी।।
सैकड़ों स्वच्छंद विचरते हैं,रक्षित कैसे कोई नारि?
अवतरित पुनः हो हे राघव!कि रहें निराभय हो सारी,
हम वानर -सेना बन जाएँ,जब तुम आओ हे त्रिपुरारी।।