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रोज़ा पार्क्स..

कॉलेज जाने की जल्दी थी,

बेटी नहाकर घुसलखाने से बाहर निकली


"आँगन में!"

माँ ने इशारा किया


उसने अपने गीले अंतर्वस्त्र भीतर वाले आँगन में 

,रस्सी के कोने में टाँग दिए

माँ ने एक सूती गमछा ऊपर रख दिया।


ये रोज़ का किस्सा था,

सर्दियों में कई बार समस्या भी होती थी,भीतर आँगन में धूप नहीं पहुंचती।

सारा दिन असहज़ रहती


एक दिन बेटी ने बाहर के बरामदे में रस्सी बाँध दी

घुसलखाने से निकलकर आँगन नहीं,बरामदे का रुख किया।


"बेशर्म!

बदतमीज़, बेहूदा.."

काफ़ी कुछ कहा गया

इस बार अड़ गई।घर में बातचीत बंद हो गयी।


साल बीत गए

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