मुँह पर काली चादर ढाँपे,रात डराने आई थी
नींद में होगी,भूल गयी वो, मेरी ही परछाई थी
उसकी आँखें लाल रंगीं थीं,पाँव भी शायद उल्टे थे
आग से डरती होगी मैंने, सिगरेट एक जलाई थी
बाहर साँकल खड़क रही थी,साँस किसी की उखड़ी थी
कुंडी खोली,लिपट गई थी,हवा बहुत घबराई थी
छज्जे पर थे संग हवा,मैं, मौसम भी रूमानी था
झींगुर कुछ समझा था या फिर,सीटी यूँ ही बजाई थी
रात अकेली थी मुझ सी,सो दिल मेरा भी पिघल गया
मैं,हवा,रात,झींगुर सब बैठे,सबने सरगी खाई थी
हाथ में उसकी शगुन समझ कर,ग्यारह बूँदें ओस भरीं
भोर का दूल्हा आया था, उसकी इस पहर बिदाई थी
:/शंकर
