आँख से अंधा,कान का बहरा,मन किस मन की माने रे
रंग धुएँ से चित्र बनाता,क्या खोज रहा क्या जाने रे
आप जलाता,आप सुलगता,आप हीं धू-धू राख हुआ
आप अघोरी कोई चिता से,भस्म आप की छाने रे
तन के बरतन माँजन लागा, राख बची जो ठंडी रे
रे.रे..मन पाखंडी रे
:/शंकर
आँख से अंधा,कान का बहरा,मन किस मन की माने रे
रंग धुएँ से चित्र बनाता,क्या खोज रहा क्या जाने रे
आप जलाता,आप सुलगता,आप हीं धू-धू राख हुआ
आप अघोरी कोई चिता से,भस्म आप की छाने रे
तन के बरतन माँजन लागा, राख बची जो ठंडी रे
रे.रे..मन पाखंडी रे
:/शंकर