शरद ऋतु का आगमन सूर्य को निस्तेज कर ,
धुंध का लग गया पहरा अरुणिमा को अंक में ले,
शीत ने डाला है डेरा।
खगवृन्द व्याकुल मूक से,
करते प्रतिक्षाअब प्रभा का शावक अचंभित पूछते ,
क्यों सूर्य ने ओड़ा है कोहरा।
तृण सुसज्जित मंत्रमुग्ध हैं,
मोती का श्रृंगार करके पुष्प ने नववधू की भांति,
पंखुड़ी से ढक लिया चेहरा।
ओस प्रक्षालन कर रही बन बूँद,
मलिन पल्लवों का वृक्ष खड़े ध्यानमग्न से,
शरद का पहने दुशाला।
असंख्य तारे टांक मकड़ी बुन रही,
नित नव्य जाला तितलियाँ उनीदी तकती,
कब छटे कुहासा हो उजाला।
मेघ आनंदित लीन हो,
निरखते प्रतिबिम्ब मनोहर प्रकृति ने कैसे तूलिका से,
शुभ्र है ये रंग डाला।