वो कुछ इस तरह से मुझे कहीं राहों में मिले
कुछ उलझे हुए जवाब जैसे सवालों में मिले।
रख कर भूल गयी थी जिन लम्हों की मैं कहीं
वही खिलते हुए गुलाब मुझे गुलशन में मिले।
जब जब उठी उंगलियाँ मेरी ओर ज़माने की
तब तब मेरे साथ वो परवरदिगार चले।